हेमन्त ऋतु, Pre-winter,मार्गशीर्ष-पौष, दिसम्बर-15 जनवरी

हिन्दू मास: मार्गशीर्ष-पौष

ग्रेगरियन मास: दिसम्बर-15 जनवरी

इस ऋतु में मौसम मध्यम शीतल होता है क्योंकि पृथ्वी की सूर्य से दूरी अधिक हो जाने की वजह से तापमान प्रति वर्ष ,कुछ महीनों के लिए कम हो जाता है । यह ऋतु अपने सुहावने एवं लुभावने मध्यम ठंडे मौसम के लिए जानी जाती है । इस कारण से यह ऋतु ‌‌‌सैलानियों को बहुत पसंद होती है। स्वस्थय की दृष्टि से भी यह ऋतु बहुत लाभदायक होती है। इस ऋतु मे गर्म कपड़े पहनना एवं आग के सामने बैठना आदि अच्छा होता है ताकि शरीर को गर्म रखा जा सके। इस ऋतु के कुछ दुष्प्रभाव भी है जैसे – कुछ लोग ठंड सहन न करने के कारण बीमार हो जाते है । दीवाली, बीहू आदि इस ऋतु मे मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहार है। हेमंत ऋतु प्रकृति मे एक आनंद एवं उत्साह भर देती है और चारों और हरियाली ही हरियाली दिखाई देने लगती है।

आयुर्वेद में हेमंत ऋतु को सेहत बनाने की ऋतु कहा गया है। हेमंत में शरीर के दोष शांत स्थिति में होते हैं। अग्नि उच्च होती है इसलिए वर्ष का यह सबसे स्वास्थ्यप्रद मौसम होता है, जिसमें भरपूर ऊर्जा, शरीर की उच्च प्रतिरक्षा शक्ति तथा अग्नि चिकित्सकों को छुट्टी पर भेज देती है। इस ऋतु में शरीर की तेल मालिश और गर्म जल से स्नान की आवश्यकता महसूस होती है। कसरत और अच्छी मात्रा में खठ्ठा-मीठा और नमकीन खाद्य शरीर की अग्नि को बढ़ाते हैं। हेमंत ऋतु में शीत वायु के लगने से अग्नि ‌‌‌वृद्धि होती है। चरक ने कहा है –

“शीते शीतानिलस्पर्शसंरुद्घो बलिनां बलीः।

पक्ता भवति…”

चरक संहिता के अनुसार हेमन्त ऋतु में संचित हुआ कफ वसन्त ऋतु में सूर्य की किरणों से प्रेरित (द्रवीभूत) होकर कुपित होता है जिससे वसन्तकाल में खाँसी, सर्दी-जुकाम, टॉन्सिल्स में सूजन, गले में खराश, शरीर में सुस्ती व भारीपन आदि की शिकायत होने की सम्भावना रहती है। जठराग्नि मन्द हो जाती है अतः इस ऋतु में आहार-विहार के प्रति सावधान रहें।

‌‌‌पथ्य आहार: इसलिए हेमन्त ऋतु में स्निग्ध घी, तैल आदि से युक्त, अम्ल तथा लवण रस युक्त भोज्य प्रदार्थों का एवं दूध से बने पदार्थों का निरन्तर सेवन करना चाहिए। हेमन्त ऋतु में दूध तथा उससे बनने वाले पदार्थ, ईंख से बनने वाले पदार्थ गुड़, खाण्ड आदि, ‌‌‌तेल, घृत, नये चावलों का भात, उड़द की दाल एवं उष्ण जल का सेवन करने वाले मनुष्यों की आयु क्षीण नहीं होती अर्थात्‌ वे दीर्घायु तथा स्वस्थ रहते हैं।

‌‌‌अपथ्य आहार: इस ऋतु में लघु (‌‌‌शीघ्र पचने वाले) तथा वातवर्धक अन्नपान का सेवन नहीं करना चाहिये।

‌‌‌पथ्य विहार: इस ऋतु में प्रत्येक दिन प्रातः काल तेल की मालिश करें एवं स्निग्ध पदार्थों से पूरे शरीर पर उबटन लगायें। शिर में तेल लगाना चाहिये। कभी-कभी पूरे शरीर से पसीना निकल जाये, इस प्रकार से स्वेदन करना चाहिए। धूप का सेवन करें। गरम मकान या तहखाने में ही निवास करना चाहिए, ताकि शीत न लगे। शीतकाल में वाहन, शयन कक्ष, बैठक कक्ष अथवा भोजन कक्ष चारों ओर से घिरा या ढका हुआ होना चाहिये। शय्या आदि पर ओढ़ने के कम्बल, रजाई होंतथा गरम वस्त्रों को धारण करना चाहिए। यह समय आनन्द प्राप्त करने का है। अतः सभी प्रकार के सुख भोगों की पूर्ति, मात्रा और नियम के अनुसार इस हेमन्त ऋतु में की जा सकती है। लेकिन यह चर्या केवल स्वस्थों के लिए ही है।

‌‌‌अपथ्य विहार: हवा के तेज झौंके के सामने न रहें, भूखे न रहें अथवा थोड़ा भोजन ना करें। शीतल जल में चीनी मिलाकर घोले हुए सत्तू का सेवन नहीं करें।

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