ग्रीष्म ऋतु, Summer Season

हिन्दू मास: ज्येष्ठ-आषाढ

ग्रेगरियन मास: मई-जून

सुश्रुत संहिता सूत्र में ग्रीष्म ऋतु के बारे में कहा गया है:

ग्रीष्मे तीक्ष्णांशुरादित्यो मारुतो नैऋृतो सुखः।

भूस्तप्त सरितस्तन्व्यो दिशः प्रज्वलिता इव।।

अर्थात् ग्रीष्म ऋतु में सूर्य (पृथ्वी के पास आ जाने के कारण) तीखी किरणों वाला हो जाता है, नैऋत दिशा की कष्टदायक हवा बहती है जिससे पृथ्वी तपने लगती है, नदियां सूख जाती हैं या पतली धार वाली हो जाती हैं और सब दिशाएं गर्म से जलती हुई मालूम देती हैं। ग्रीष्म ऋतु, आदानकाल की अन्तिम ऋतु होती है।

पथ्य आहार: इस ऋतु में किये जाने वाले आहार में ऐसे ही पदार्था एवं व्यंजनों का सेवन करने का ध्यान रखना चाहिए जो शरीर में स्निग्धता, तरावट और शीतलता लाने वाले हों। “स्वादु शीतं द्रवं स्निग्धमन्न पानं तदाहितम्’ (चरक संहिता) के अनुसार  ग्रीष्म ऋतु में मधुर रस युक्त तथा शीतवीर्य (ठण्डी तासीर वाले) गुण वाले, तरल तथा स्निग्ध (चिकनाई युक्त) द्रव्यों का सेवन करना चाहिए ताकि शरीर में शीतलता व तरावट बनी रहे जिसकी ग्रीष्म काल में शरीर को सख्त ज़रूरत होती है।

इसके लिए दूध चावल की खीर, दूध, घी, मीठे चावल, सत्तू  का घोल, नींबू की शिकंजी, दूध-पानी की मीठी लस्सी, आंवलें का मुरब्बा, गुलकन्द आदि का सेवन करना हितकारी होता है। “भजेन्मधुरमेवान्नं लघुस्निग्धं हिमं द्रवम्’ (वाग्भट) के अनुसार ग्रीष्म ऋतु में मीठे, हलके, स्निग्ध, शीतल और सुपाच्य पदार्था का ही सेवन करना चाहिए। ऐसे पदार्थों में ताज़ी चपाती (रोटी) के साथ चने की  भाजी, बथुआ, चौराई, परवल, पके लाल टमाटर, छिलका रहित आलू, हरी मटर, करेला, कच्चे केले, तरबूज के छिलके, हरी ककड़ी की शाक-सब्ज़ी और दालों में सिर्फ मसूर की दाल या छिलके वाली मूंग की दाल का ही सेवन करना चाहिए। अरहर या चने की दाल खाएं तो चावल के साथ खाएं या 1-2 चम्मच शुद्ध घी में जीरा डाल कर इसका तड़का लगा कर खाएं ताकि इन दालों की खुश्की खत्म हो जाए। फलों में मौसमी फलों का सेवन करें। दही का सेवन करें तो घर का जमा हुआ, ताज़ा और बिना कटा हुआ दही थोड़ा पानी डाल कर और अपनी रुचि के अनुसार शक्कर या नमक पिसा जीरा डाल कर खाएं। अन्य पदार्था में सिंघाड़ा, प्याज, नींबू, हरा धनिया, पोदीना, कच्चे आम को भून कर बनाया हुआ मीठा पना, नींबू की मीठी शिकंजी, ठण्डाई, पतला सत्तू, गुलकन्द, आगरे का पेठा, आंवले का मुरब्बा, दूध पानी की मीठी लस्सी आदि सेवन करने योग्य पथ्य पदार्थ हैं।

अपथ्य आहार: ग्रीष्म ऋतु में कड़वे, ‌‌‌कषैले, चरपरे, खट्टे, तेज़ मिर्च मसाले, तले हुए, बेसन के बने, लाल मिर्च व गरम मसालेयुक्त, बासे और दुर्गन्धयुक्त पदार्था का सेवन नहीं करना चाहिए। खट्टा, कटा हुआ और बासा दही नहीं खाना चाहिए, बिना पानी और शक्कर या नमक जीरा मिलाए दही नहीं खाना चाहिए और रात में दही नहीं खाना चाहिए। फ्रिज में रखा पानी नहीं पानी चाहिए। पीना ही चाहें तो पानी फ्रिज से बाहर निकाल कर थोड़ी देर रखा रहने दें ताकि पानी की असामान्य शीतलता सामान्य हो जाए फिर पिएं। इससे गले में खराश, मन्दाग्नि, अपच, सर्दी जुकाम, टांसिलाइटिस आदि व्याधियां नहीं होतीं। बहुत ज्यादा गर्म या बहुत ज्यादा ठण्डा खान-पान न करें। उड़द व चने की दाल, अरहर (तुअर) की दाल, लहसुन, इमली व अमचूर की खटाई, शहद, सिरका आदि का सेवन न करें।

पथ्य विहार: ग्रीष्म ऋतु में पालन योग्य विहार यानी रहन सहन (दिनचर्या) की शुरूआत सुबह उठने से ही हो जाती है। सुबह सूर्योदय होने से पहले तीन काम निपटा लेना चाहिए। ठण्डा पानी चार गिलास या जितना अधिक से अधिक मात्रा में पी कर शौच क्रिया करना, दूसरा स्नान करना और तीसरा वायु सेवन के लिए 3-4 किलो मीटर तक घूम कर लौट आना। इसके बाद सूर्योदय हो या हो रहा हो। लौट कर योगासन या व्यायाम करें तो क्या कहने ! इसके बाद आठ बजने से पहले चाहें तो नाश्ता कर लें। ग्रीष्म ऋतु में भी अन्य ऋतुओं की तरह निश्चित समय पर ही भोजन करना चाहिए यानी भूख सहन नहीं करना चाहिए। भूख से थोड़ी कम मात्रा में खाना चाहिए और प्रत्येक कौर 32 बार चबाना चाहिए। तेल से शरीर की मालिश करके स्नान करना और रात को सोते समय मे विसर्जन के लिए शौचालय जाना हितकारी होता है।

अपथ्य विहार: इस ऋतु में कुछ लोग सुबह देर तक सोये रहना पसन्द करते हैं जो शरीर, स्वास्थ्य और चेहरे की सुन्दरता, खास करके आंखों के‌‌‌ लिए हानिकारक होता है ‌‌‌इसलिए सुबह देर तक सोये रहना और देर रात तक जागना ठीक नहीं। सहवास में  अति न करें बल्कि आयुर्वेद ने तो मना ही किया है यथा- “ग्रीष्मकाले निषेवेत मैथुनाद्विरतो नरः ’अर्थात् ग्रीष्म काल में मैथुन (सहवास) करना ही नहीं चाहिए। अब यह उपदेश उस ज़माने में दिया गया था जब न तो बोल्ड सीन वाली फिल्में थीं, न अर्धनग्न, भड़कीले कामोत्तेजक दृश्यों वाले विज्ञापन दिखाये जाते थे, न चोरी छिपे अशलील फिल्में देखने की जुगाड़ होती थी तो पुरुष को संयम रखने में कठिनाई नहीं होती थी पर आज के ज़माने में जब कामोत्तेजक स्थितियां विभिन्न कारणों और रूपों से कदम-कदम पर सामने उपस्थित हो रही हों तब ऐसे उपदेश पर अमल करना हर किसी के बस की बात नहीं है इसलिए हमने कहा कि ग्रीष्म ऋतु में कम से कम सहवास करें। तेज़ धूप में घूमना, भूखे प्यासे घूमना, लगातार भारी श्रम करना, अति व्यायाम करना, दिन में सोना, मल-मूत्र और प्यास के वेग को रोकना आदि नहीं करना चाहिए।

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